Monday, 9 December 2024

बातें

 चलो कुछ बातें करते हैं

बातें ही तो हैं बातों का क्या 

अलग बात है कि हर बात की अलग बात है 

ज़रा डपट घोल दें तो क्रोध हो जाए 

ज़रा इतराना छिड़क दें तो तंज हो जाए 

ज़रा इठला दें तो नाज़ हो जाए 

ज़रा दहशतगर्दी हो तो डर हो जाए 

ये क्रोध, तंज, नाज़, डर, फिक्र 

जो मिल बैठें ये साथ सभी तो इश्क़ हो जाए 


अच्छा छोड़ो सब 

चलो कुछ बात ही करते हैं

बातों का क्या ही है 

अच्छा सुनो 

बात करने से पहले बातों का एक करार करोगे क्या 

मैं क्रोध कहूं तो डर समझ लेना 

बात कोई मेरी डर कहे जो 

तो तुम मेरी फिक्र समझ लेना 

मैं जो कहूं फिक्र अपनी 

तो तुम मेरा प्रेम समझ लेना 


अच्छा अब बहुत हो गई बातें 

अब कुछ बातें तुमसे करते है 

और बताओ कैसे हो तुम?


Friday, 11 February 2022

घर ही तो है

 नीले अम्बर को छूता

हवा के वेग को चीरता 

ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है

अखिर वो बस एक घर ही तो है 


फिर क्या फर्क़ पड़ता है,

अगर वो किसी माँ-पिता के सपनों का महल हो.।

क्या फर्क़ पड़ता है,

अगर वो उस पिता के जीवन की पूंजी है 

वो माँ के प्रेम की सज्जा समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है

अखिर वो बस एक घर ही तो है 


उस घर के उन्हीं गलियारों में तो 

मुन्ना-मुन्नी लुका-छिपी खेला करते थे कभी 

उन्हीं की खिलखिलाहट से तो गलियारे चहक उठते थे कभी 

चहक उठता था वो घर भी तभी 

पर क्या फर्क़ पड़ता है 

मुन्ना-मुन्नी के बचपन समेटे ही सही पर ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है

अखिर वो बस एक घर ही तो है 


इक रोज़ था वो जब मेहमानों का तांता लगा था 

गुलदस्ते मिठाइयों और बधाईयाँ, सब मानो बरस रही थी अंगने में 

रोशन सा प्रतीत हो रहा है नभ भी उस पल 

अखिर उसके पिता को राजा ने दरबार में पद जो नवाजा़ था

खुशी से नाच उठा था वो घर भी उस पल 

पर क्या फर्क़ पड़ता है

चंद लम्हों को समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है

अखिर वो बस एक घर ही तो है


अब वो चंद कमरों का मीनार नहीं था 

बगीचे के गुलशनों की महक से महकता 

वो इन्द्रधनुष से रंगा स्वर्ग के महल सा था 

पर क्या फर्क़ पड़ता है 

जीवन के रंगों की दास्तां समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है 

अखिर वो बस एक घर ही तो है


इक रोज़ फ़िर हुआ जब मेहमानों का तांता लगा था 

पर आज ना गुलदस्ते थे ना मिठाइयां 

थम सा गया था काल भी उस पल, नम थी हर आंख जिस कल 

क्या मुन्ना क्या मुन्नी और माँ का क्या 

सिसक उठा था वो घर भी उस पल 

पर क्या फर्क पड़ता है 

भावहीन रचना बन भावनायें समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है 

अखिर वो बस एक घर ही तो है 


अब भी वो चंद कमरों का मीनार नहीं है 

मुन्नी के हर आंसू का राज़ दफन किए हुए 

मुन्ना के कंधों को ज़िम्मेदारी और लड़कपन का तौल करते देखता 

माँ के ममता और अनुशासन के द्वंद्व का साक्षी

हर दीवार खुद मेें है कहानी समेटे हुए

पर क्या फर्क़ पड़ता है 

किताब में कहानियां समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है 

अखिर वो बस एक घर ही तो है


अब ना मुन्ना वो मुन्ना है 

अब ना मुन्नी वो मुन्नी है 

गुम हैं दोनो जीवन की गुत्थी की उलझनों में

और गुम है उन गलियारों की चहक भी उनके मासूम ज़ज्बों में.

गुम है उस घर की चहक भी उनके सपनों में कहीं

पर क्या फर्क़ पड़ता है 

ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है

वो बस एक घर ही तो है


आज भी तना है वो 

अपनी उसी शान को लिये 

वो जो बीत गया उसकी कहानियां समेटे 

वो जो आने वाला है उसके सपने लिये 

हर उत्सव हर शोक की झलकियां खुद में समेटे हुए 

पर क्या फर्क़ पड़ता है 

अखिर वो 

नीले अम्बर को छूता

हवा के वेग को चीरता 

ईंटों से तना 

इक बेजान ढांचा ही तो है

वो बस एक घर ही तो है 




Friday, 5 March 2021

सफर अभी बाकी है

 हो हर कदम पर लाख ठोकरें 

पर मंजिल की देहलीज़ छूना अभी बाकी है 

हे पथिक उठ चल की सफर अभी बाकी है 

है हताश यूँ क्यों तू की सफर अभी बाकी है 


हों चाहें कपास की चादर राहों में बिछी हुई 

हो चाहें काँटे उस कपास को ओढ़े हुए 

संभल कर तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है 

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


हर-दर-कदम राही मिलते रहेंगे 

राम तो संग होंगे, कुछ रावण भी हाथ थामेंगे 

अड़िग - अजय तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


पथ भी कभी छाव से अछूता कहाँ 

महल भी मिलेंगे कभी बग़िया का आश्रय भी 

पर यूँ तप्ता तू धूप में बढ़े चल की, सफर अभी बाकी है

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


तुझसे ही आरम्भ, तुझसे ही अंत ये सफ़रनामा है 

जन्मों का ये सफ़र है, बस मंज़िल की दहलीज़-पार जाना है 

हे पथिक उठ चल की, सफर अभी बाकी है 

ना हो हताश यूँ तू की, सफर अभी बाकी है 




Sunday, 16 August 2020

चलना तुम्हे अकेले ही है

 पाती- पाती टहनियों को आगोश में लिए ही तो  

छाँव  बिखेरती है।  

बूँद-बूँद संग बाहें थामकर ही तो 

सागर बुनती है। 

रंग- संग सात हो तभी तो 

इंद्रधनुष रचते है।  


अकेले जो ये एक क्षण भी हुए 

अस्तित्व स्वयं का खो देते हैं। 

पर, इंसान हो तुम

जीना तुम्हे है तो  

चलना तुम्हे अकेले ही है 


ज़ख्मों पर नमक डालेंगे तो बहुत 

पर उनपर मलहम लगाना 

तुम्हें अकेले ही है 


चाँदनी रात में,

चेहरे साथ होंगे तो बहुत। 

पर अमावस की ठोकरों से संभलना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


कामयाबी के हर तमगे को, 

नवाजेंगे तो बहुत। 

पर हर हार में संभलना,

तुम्हे अकेले ही है। 


हर जंग में फौज़ी मर मिटने को,

साथ होंगे तो बहुत। 

पर खुदसे लड़ी हर जंग में लड़ना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


ख़ुशियों में संग ठहाके लगाएंगे तो बहुत 

पर सूखी आँखों में भी 

हर पल रहने वाले आंसुओं को सुखाना, 

तुम्हे अकेले ही है।


खायी की गहराईयों में, 

गिराने को हैं तो बहुत।  

पर शिखर तक पहुंचना,

तुम्हे अकेले ही है। 


हर बनी हुई राह में, 

चलना सिखाने को हैं तो बहुत। 

पर निर्जन ज़मीन पर राह बनाना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


दिन के उजाले में, 

हज़ारों की भीड़ लगाने वाले हैं तो बहुत।  

पर रौशन अँधेरे में बसे अकेलेपन को दूर करना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


ये दुनिया है स्वार्थ की, 

छल- मतलब- तो बिकते हैं यहाँ बाज़ारों में। 

जन्म लिया तुमने अकेले है, 

मरना भी तुम्हे अकेले है। 


पर, यहाँ जीना है तो, 

चलना तुम्हे अकेले ही है।  

चलना तुम्हे अकेले ही है।| 




Tuesday, 16 June 2020

उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए

उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए

माना कभी हमारा भी हाथ थामा था किसी ने कभी
माना उन हाथों का सौहर्द्य अब इन हाथों में नही।
माना इस मुख की खुशी उनकी मुस्कान बन उकेरी होती थी कभी,
माना अब वो मुस्कान तस्वीरों में ही गुम है कहीं।

कभी उनकी हर सुबह और रात, राम नही हमारे नाम से ही थी,
ख्यालोँ में ही सही अब उनकी पुकार सुन लेते हैं हम भी कभी।
कभी हमारी आवाज़ को तरस छलके थे उनके भी आँसू,
उनकी आवाज़ को तरस लेते हैं हम भी कभी।

माना हमारे आँसुओं को उगंलियों में समेट पूछा करते थे यूं ही
"क्या मोती देखा है तुमने कभी?",
माना हमारी हर ख्वाहिश उनका मक्सद हुआ करती कभी।
माना उनके वापिस आने तक हम भी बेचैन रहते थे कभी,
माना तौहफे में दी हमारी हर कागज़ की कश्ती उनका अभिमान होती थी कभी।

अब उन कदमों की आहट न हो तो न सही।
अब वो खिलखिलाती हंसी न हो तो न सही।
अब उस तेजस्वी मुख की झलक न हो तो न सही।
अब उनकी हर याद ज़हन में दफन हो तो दफन सही।

पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए अब भी।

यूँ ही चलते कमज़ोर डगर पर किसी,
वो हाथ हमे थामेंगे फिरसे कभी।
यूँ ही किसी भोर में फिर हमारा नाम पुकारेंगे कभी।
यूँ ही जीवन कि जंग में जीत पर किसी,
वो आँखें गर्व से नम होंगी फिरसे कभी।

यूँ ही किसी क्षण साथ बैठ,
वो हंसी के ठिठोले बरसेंगे फिरहे कभी।
यूँ ही राह पर टिकी नज़रों का इंतज़ार
वो उस आहत से खत्म फिरसे होगा कभी।

क्योंकी कहा न,
झूठी सी सही
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए।।



Sunday, 8 March 2020

इंसान

सदियों से जकड़ा है ज़ंजीरों में ,
ज़ख्मों से आह निकालनी तो थी ही। 
सदियों से छला है तहज़ीबों के भेस में, 
बगावतों से चिंगारी निकालनी तो थी ही।

कभी त्याग दिया अपना जीवन किसी के बेटे की आस को, 
तो कभी पर्दे में सिमट कर भी बेपर्दा होती रही।  
कभी अपनों के अरमानों तले, सपनों की बली चढ़ा दी, 
तो कभी पति की आग में सती हो गयी। 

आह निकली है तो शोर तो होना था ही। 
चिंगारी जाली है तो आग को दहकना था ही।  
शोर मचा है तो बेड़ियों तक पहुंचेगा ज़रूर। 
आग दहकि है तो बेड़ियाँ टूटेंगी ज़रूर। 

फिर उदय होगा एक नयी सुबह का।  
जहाँ न ज़ंजीरों होंगी,
न तहज़ीबों के नाम छल होगा। 
जहाँ न बचपन बलि चढ़ेगा ,
न सपनों का कत्ल होगा। 

वो सुबह,
जहाँ न मैं नारी होऊंगी ,
जहाँ न तू नर होगा। 
जहाँ मैं भी इंसान होउंगी , 
जहाँ तू भी इंसान होगा ||