नीले अम्बर को छूता
हवा के वेग को चीरता
ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
फिर क्या फर्क़ पड़ता है,
अगर वो किसी माँ-पिता के सपनों का महल हो.।
क्या फर्क़ पड़ता है,
अगर वो उस पिता के जीवन की पूंजी है
वो माँ के प्रेम की सज्जा समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
उस घर के उन्हीं गलियारों में तो
मुन्ना-मुन्नी लुका-छिपी खेला करते थे कभी
उन्हीं की खिलखिलाहट से तो गलियारे चहक उठते थे कभी
चहक उठता था वो घर भी तभी
पर क्या फर्क़ पड़ता है
मुन्ना-मुन्नी के बचपन समेटे ही सही पर ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
इक रोज़ था वो जब मेहमानों का तांता लगा था
गुलदस्ते मिठाइयों और बधाईयाँ, सब मानो बरस रही थी अंगने में
रोशन सा प्रतीत हो रहा है नभ भी उस पल
अखिर उसके पिता को राजा ने दरबार में पद जो नवाजा़ था
खुशी से नाच उठा था वो घर भी उस पल
पर क्या फर्क़ पड़ता है
चंद लम्हों को समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
अब वो चंद कमरों का मीनार नहीं था
बगीचे के गुलशनों की महक से महकता
वो इन्द्रधनुष से रंगा स्वर्ग के महल सा था
पर क्या फर्क़ पड़ता है
जीवन के रंगों की दास्तां समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
इक रोज़ फ़िर हुआ जब मेहमानों का तांता लगा था
पर आज ना गुलदस्ते थे ना मिठाइयां
थम सा गया था काल भी उस पल, नम थी हर आंख जिस कल
क्या मुन्ना क्या मुन्नी और माँ का क्या
सिसक उठा था वो घर भी उस पल
पर क्या फर्क पड़ता है
भावहीन रचना बन भावनायें समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
अब भी वो चंद कमरों का मीनार नहीं है
मुन्नी के हर आंसू का राज़ दफन किए हुए
मुन्ना के कंधों को ज़िम्मेदारी और लड़कपन का तौल करते देखता
माँ के ममता और अनुशासन के द्वंद्व का साक्षी
हर दीवार खुद मेें है कहानी समेटे हुए
पर क्या फर्क़ पड़ता है
किताब में कहानियां समेटे ही सही पर इक बेजान ढांचा ही तो है
अखिर वो बस एक घर ही तो है
अब ना मुन्ना वो मुन्ना है
अब ना मुन्नी वो मुन्नी है
गुम हैं दोनो जीवन की गुत्थी की उलझनों में
और गुम है उन गलियारों की चहक भी उनके मासूम ज़ज्बों में.
गुम है उस घर की चहक भी उनके सपनों में कहीं
पर क्या फर्क़ पड़ता है
ईंटों से तना इक बेजान ढांचा ही तो है
वो बस एक घर ही तो है
आज भी तना है वो
अपनी उसी शान को लिये
वो जो बीत गया उसकी कहानियां समेटे
वो जो आने वाला है उसके सपने लिये
हर उत्सव हर शोक की झलकियां खुद में समेटे हुए
पर क्या फर्क़ पड़ता है
अखिर वो
नीले अम्बर को छूता
हवा के वेग को चीरता
ईंटों से तना
इक बेजान ढांचा ही तो है
वो बस एक घर ही तो है