उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए
माना कभी हमारा भी हाथ थामा था किसी ने कभी
माना उन हाथों का सौहर्द्य अब इन हाथों में नही।
माना इस मुख की खुशी उनकी मुस्कान बन उकेरी होती थी कभी,
माना अब वो मुस्कान तस्वीरों में ही गुम है कहीं।
कभी उनकी हर सुबह और रात, राम नही हमारे नाम से ही थी,
ख्यालोँ में ही सही अब उनकी पुकार सुन लेते हैं हम भी कभी।
कभी हमारी आवाज़ को तरस छलके थे उनके भी आँसू,
उनकी आवाज़ को तरस लेते हैं हम भी कभी।
माना हमारे आँसुओं को उगंलियों में समेट पूछा करते थे यूं ही
"क्या मोती देखा है तुमने कभी?",
माना हमारी हर ख्वाहिश उनका मक्सद हुआ करती कभी।
माना उनके वापिस आने तक हम भी बेचैन रहते थे कभी,
माना तौहफे में दी हमारी हर कागज़ की कश्ती उनका अभिमान होती थी कभी।
अब उन कदमों की आहट न हो तो न सही।
अब वो खिलखिलाती हंसी न हो तो न सही।
अब उस तेजस्वी मुख की झलक न हो तो न सही।
अब उनकी हर याद ज़हन में दफन हो तो दफन सही।
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए अब भी।
यूँ ही चलते कमज़ोर डगर पर किसी,
वो हाथ हमे थामेंगे फिरसे कभी।
यूँ ही किसी भोर में फिर हमारा नाम पुकारेंगे कभी।
यूँ ही जीवन कि जंग में जीत पर किसी,
वो आँखें गर्व से नम होंगी फिरसे कभी।
यूँ ही किसी क्षण साथ बैठ,
वो हंसी के ठिठोले बरसेंगे फिरहे कभी।
यूँ ही राह पर टिकी नज़रों का इंतज़ार
वो उस आहत से खत्म फिरसे होगा कभी।
क्योंकी कहा न,
झूठी सी सही
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए।।
माना कभी हमारा भी हाथ थामा था किसी ने कभी
माना उन हाथों का सौहर्द्य अब इन हाथों में नही।
माना इस मुख की खुशी उनकी मुस्कान बन उकेरी होती थी कभी,
माना अब वो मुस्कान तस्वीरों में ही गुम है कहीं।
कभी उनकी हर सुबह और रात, राम नही हमारे नाम से ही थी,
ख्यालोँ में ही सही अब उनकी पुकार सुन लेते हैं हम भी कभी।
कभी हमारी आवाज़ को तरस छलके थे उनके भी आँसू,
उनकी आवाज़ को तरस लेते हैं हम भी कभी।
माना हमारे आँसुओं को उगंलियों में समेट पूछा करते थे यूं ही
"क्या मोती देखा है तुमने कभी?",
माना हमारी हर ख्वाहिश उनका मक्सद हुआ करती कभी।
माना उनके वापिस आने तक हम भी बेचैन रहते थे कभी,
माना तौहफे में दी हमारी हर कागज़ की कश्ती उनका अभिमान होती थी कभी।
अब उन कदमों की आहट न हो तो न सही।
अब वो खिलखिलाती हंसी न हो तो न सही।
अब उस तेजस्वी मुख की झलक न हो तो न सही।
अब उनकी हर याद ज़हन में दफन हो तो दफन सही।
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए अब भी।
यूँ ही चलते कमज़ोर डगर पर किसी,
वो हाथ हमे थामेंगे फिरसे कभी।
यूँ ही किसी भोर में फिर हमारा नाम पुकारेंगे कभी।
यूँ ही जीवन कि जंग में जीत पर किसी,
वो आँखें गर्व से नम होंगी फिरसे कभी।
यूँ ही किसी क्षण साथ बैठ,
वो हंसी के ठिठोले बरसेंगे फिरहे कभी।
यूँ ही राह पर टिकी नज़रों का इंतज़ार
वो उस आहत से खत्म फिरसे होगा कभी।
क्योंकी कहा न,
झूठी सी सही
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए।।
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