चलो कुछ बातें करते हैं
बातें ही तो हैं बातों का क्या
अलग बात है कि हर बात की अलग बात है
ज़रा डपट घोल दें तो क्रोध हो जाए
ज़रा इतराना छिड़क दें तो तंज हो जाए
ज़रा इठला दें तो नाज़ हो जाए
ज़रा दहशतगर्दी हो तो डर हो जाए
ये क्रोध, तंज, नाज़, डर, फिक्र
जो मिल बैठें ये साथ सभी तो इश्क़ हो जाए
अच्छा छोड़ो सब
चलो कुछ बात ही करते हैं
बातों का क्या ही है
अच्छा सुनो
बात करने से पहले बातों का एक करार करोगे क्या
मैं क्रोध कहूं तो डर समझ लेना
बात कोई मेरी डर कहे जो
तो तुम मेरी फिक्र समझ लेना
मैं जो कहूं फिक्र अपनी
तो तुम मेरा प्रेम समझ लेना
अच्छा अब बहुत हो गई बातें
अब कुछ बातें तुमसे करते है
और बताओ कैसे हो तुम?
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