Saturday, 28 March 2020

Sunday, 8 March 2020

इंसान

सदियों से जकड़ा है ज़ंजीरों में ,
ज़ख्मों से आह निकालनी तो थी ही। 
सदियों से छला है तहज़ीबों के भेस में, 
बगावतों से चिंगारी निकालनी तो थी ही।

कभी त्याग दिया अपना जीवन किसी के बेटे की आस को, 
तो कभी पर्दे में सिमट कर भी बेपर्दा होती रही।  
कभी अपनों के अरमानों तले, सपनों की बली चढ़ा दी, 
तो कभी पति की आग में सती हो गयी। 

आह निकली है तो शोर तो होना था ही। 
चिंगारी जाली है तो आग को दहकना था ही।  
शोर मचा है तो बेड़ियों तक पहुंचेगा ज़रूर। 
आग दहकि है तो बेड़ियाँ टूटेंगी ज़रूर। 

फिर उदय होगा एक नयी सुबह का।  
जहाँ न ज़ंजीरों होंगी,
न तहज़ीबों के नाम छल होगा। 
जहाँ न बचपन बलि चढ़ेगा ,
न सपनों का कत्ल होगा। 

वो सुबह,
जहाँ न मैं नारी होऊंगी ,
जहाँ न तू नर होगा। 
जहाँ मैं भी इंसान होउंगी , 
जहाँ तू भी इंसान होगा ||