चेहरे हैं पर चेहरे नहीं,
यहाँ नक़ाबों पर भी नक़ाब हैं,
चेहरे कहाँ ढूँढ़ोगे इन नक़ाबों के बाज़ार में।
पानी आँसू बन बरसते रहे,
अश्क़ आँखों में ही सूखते रहे,
कंधे जिन्हे खुद न मिले, वे औरों के आँसू पोंछते रहे।
सच अपनी कड़वाहट में सिमटते रहे,
झूठ की मिठास के रंग सब ढ़लते रहे,
अपने हैं पर अपने नही, सच्चे झूठे की कशमकश में अपने पहचानोगे कैसे।
दर्द मुस्कुराहट के तीर ताने खड़े रहे,
फ़रेब मजबूरियों के साए में छिपे रहे,
औरों से रश्क में खुद को मली खुशियां भी भूलते रहे।
चहरे हैं पर चहरे नही,
यहां हर चेहरा एक नक़ाब है।
चेहरे कहां ढूँढोगे इस मतलब के संसार में।
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