पाती- पाती टहनियों को आगोश में लिए ही तो
छाँव बिखेरती है।
बूँद-बूँद संग बाहें थामकर ही तो
सागर बुनती है।
रंग- संग सात हो तभी तो
इंद्रधनुष रचते है।
अकेले जो ये एक क्षण भी हुए
अस्तित्व स्वयं का खो देते हैं।
पर, इंसान हो तुम
जीना तुम्हे है तो
चलना तुम्हे अकेले ही है
ज़ख्मों पर नमक डालेंगे तो बहुत
पर उनपर मलहम लगाना
तुम्हें अकेले ही है
चाँदनी रात में,
चेहरे साथ होंगे तो बहुत।
पर अमावस की ठोकरों से संभलना,
तुम्हे अकेले ही है।
कामयाबी के हर तमगे को,
नवाजेंगे तो बहुत।
पर हर हार में संभलना,
तुम्हे अकेले ही है।
हर जंग में फौज़ी मर मिटने को,
साथ होंगे तो बहुत।
पर खुदसे लड़ी हर जंग में लड़ना,
तुम्हे अकेले ही है।
ख़ुशियों में संग ठहाके लगाएंगे तो बहुत
पर सूखी आँखों में भी
हर पल रहने वाले आंसुओं को सुखाना,
तुम्हे अकेले ही है।
खायी की गहराईयों में,
गिराने को हैं तो बहुत।
पर शिखर तक पहुंचना,
तुम्हे अकेले ही है।
हर बनी हुई राह में,
चलना सिखाने को हैं तो बहुत।
पर निर्जन ज़मीन पर राह बनाना,
तुम्हे अकेले ही है।
दिन के उजाले में,
हज़ारों की भीड़ लगाने वाले हैं तो बहुत।
पर रौशन अँधेरे में बसे अकेलेपन को दूर करना,
तुम्हे अकेले ही है।
ये दुनिया है स्वार्थ की,
छल- मतलब- तो बिकते हैं यहाँ बाज़ारों में।
जन्म लिया तुमने अकेले है,
मरना भी तुम्हे अकेले है।
पर, यहाँ जीना है तो,
चलना तुम्हे अकेले ही है।
चलना तुम्हे अकेले ही है।|