Sunday, 16 August 2020

चलना तुम्हे अकेले ही है

 पाती- पाती टहनियों को आगोश में लिए ही तो  

छाँव  बिखेरती है।  

बूँद-बूँद संग बाहें थामकर ही तो 

सागर बुनती है। 

रंग- संग सात हो तभी तो 

इंद्रधनुष रचते है।  


अकेले जो ये एक क्षण भी हुए 

अस्तित्व स्वयं का खो देते हैं। 

पर, इंसान हो तुम

जीना तुम्हे है तो  

चलना तुम्हे अकेले ही है 


ज़ख्मों पर नमक डालेंगे तो बहुत 

पर उनपर मलहम लगाना 

तुम्हें अकेले ही है 


चाँदनी रात में,

चेहरे साथ होंगे तो बहुत। 

पर अमावस की ठोकरों से संभलना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


कामयाबी के हर तमगे को, 

नवाजेंगे तो बहुत। 

पर हर हार में संभलना,

तुम्हे अकेले ही है। 


हर जंग में फौज़ी मर मिटने को,

साथ होंगे तो बहुत। 

पर खुदसे लड़ी हर जंग में लड़ना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


ख़ुशियों में संग ठहाके लगाएंगे तो बहुत 

पर सूखी आँखों में भी 

हर पल रहने वाले आंसुओं को सुखाना, 

तुम्हे अकेले ही है।


खायी की गहराईयों में, 

गिराने को हैं तो बहुत।  

पर शिखर तक पहुंचना,

तुम्हे अकेले ही है। 


हर बनी हुई राह में, 

चलना सिखाने को हैं तो बहुत। 

पर निर्जन ज़मीन पर राह बनाना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


दिन के उजाले में, 

हज़ारों की भीड़ लगाने वाले हैं तो बहुत।  

पर रौशन अँधेरे में बसे अकेलेपन को दूर करना, 

तुम्हे अकेले ही है। 


ये दुनिया है स्वार्थ की, 

छल- मतलब- तो बिकते हैं यहाँ बाज़ारों में। 

जन्म लिया तुमने अकेले है, 

मरना भी तुम्हे अकेले है। 


पर, यहाँ जीना है तो, 

चलना तुम्हे अकेले ही है।  

चलना तुम्हे अकेले ही है।| 




Tuesday, 16 June 2020

उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए

उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए

माना कभी हमारा भी हाथ थामा था किसी ने कभी
माना उन हाथों का सौहर्द्य अब इन हाथों में नही।
माना इस मुख की खुशी उनकी मुस्कान बन उकेरी होती थी कभी,
माना अब वो मुस्कान तस्वीरों में ही गुम है कहीं।

कभी उनकी हर सुबह और रात, राम नही हमारे नाम से ही थी,
ख्यालोँ में ही सही अब उनकी पुकार सुन लेते हैं हम भी कभी।
कभी हमारी आवाज़ को तरस छलके थे उनके भी आँसू,
उनकी आवाज़ को तरस लेते हैं हम भी कभी।

माना हमारे आँसुओं को उगंलियों में समेट पूछा करते थे यूं ही
"क्या मोती देखा है तुमने कभी?",
माना हमारी हर ख्वाहिश उनका मक्सद हुआ करती कभी।
माना उनके वापिस आने तक हम भी बेचैन रहते थे कभी,
माना तौहफे में दी हमारी हर कागज़ की कश्ती उनका अभिमान होती थी कभी।

अब उन कदमों की आहट न हो तो न सही।
अब वो खिलखिलाती हंसी न हो तो न सही।
अब उस तेजस्वी मुख की झलक न हो तो न सही।
अब उनकी हर याद ज़हन में दफन हो तो दफन सही।

पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए अब भी।

यूँ ही चलते कमज़ोर डगर पर किसी,
वो हाथ हमे थामेंगे फिरसे कभी।
यूँ ही किसी भोर में फिर हमारा नाम पुकारेंगे कभी।
यूँ ही जीवन कि जंग में जीत पर किसी,
वो आँखें गर्व से नम होंगी फिरसे कभी।

यूँ ही किसी क्षण साथ बैठ,
वो हंसी के ठिठोले बरसेंगे फिरहे कभी।
यूँ ही राह पर टिकी नज़रों का इंतज़ार
वो उस आहत से खत्म फिरसे होगा कभी।

क्योंकी कहा न,
झूठी सी सही
पर उम्मीदें बहुत हैं जीने के लिए।।



Saturday, 28 March 2020

Sunday, 8 March 2020

इंसान

सदियों से जकड़ा है ज़ंजीरों में ,
ज़ख्मों से आह निकालनी तो थी ही। 
सदियों से छला है तहज़ीबों के भेस में, 
बगावतों से चिंगारी निकालनी तो थी ही।

कभी त्याग दिया अपना जीवन किसी के बेटे की आस को, 
तो कभी पर्दे में सिमट कर भी बेपर्दा होती रही।  
कभी अपनों के अरमानों तले, सपनों की बली चढ़ा दी, 
तो कभी पति की आग में सती हो गयी। 

आह निकली है तो शोर तो होना था ही। 
चिंगारी जाली है तो आग को दहकना था ही।  
शोर मचा है तो बेड़ियों तक पहुंचेगा ज़रूर। 
आग दहकि है तो बेड़ियाँ टूटेंगी ज़रूर। 

फिर उदय होगा एक नयी सुबह का।  
जहाँ न ज़ंजीरों होंगी,
न तहज़ीबों के नाम छल होगा। 
जहाँ न बचपन बलि चढ़ेगा ,
न सपनों का कत्ल होगा। 

वो सुबह,
जहाँ न मैं नारी होऊंगी ,
जहाँ न तू नर होगा। 
जहाँ मैं भी इंसान होउंगी , 
जहाँ तू भी इंसान होगा ||