Friday, 5 March 2021

सफर अभी बाकी है

 हो हर कदम पर लाख ठोकरें 

पर मंजिल की देहलीज़ छूना अभी बाकी है 

हे पथिक उठ चल की सफर अभी बाकी है 

है हताश यूँ क्यों तू की सफर अभी बाकी है 


हों चाहें कपास की चादर राहों में बिछी हुई 

हो चाहें काँटे उस कपास को ओढ़े हुए 

संभल कर तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है 

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


हर-दर-कदम राही मिलते रहेंगे 

राम तो संग होंगे, कुछ रावण भी हाथ थामेंगे 

अड़िग - अजय तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


पथ भी कभी छाव से अछूता कहाँ 

महल भी मिलेंगे कभी बग़िया का आश्रय भी 

पर यूँ तप्ता तू धूप में बढ़े चल की, सफर अभी बाकी है

है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है 


तुझसे ही आरम्भ, तुझसे ही अंत ये सफ़रनामा है 

जन्मों का ये सफ़र है, बस मंज़िल की दहलीज़-पार जाना है 

हे पथिक उठ चल की, सफर अभी बाकी है 

ना हो हताश यूँ तू की, सफर अभी बाकी है 




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