हो हर कदम पर लाख ठोकरें
पर मंजिल की देहलीज़ छूना अभी बाकी है
हे पथिक उठ चल की सफर अभी बाकी है
है हताश यूँ क्यों तू की सफर अभी बाकी है
हों चाहें कपास की चादर राहों में बिछी हुई
हो चाहें काँटे उस कपास को ओढ़े हुए
संभल कर तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है
है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है
हर-दर-कदम राही मिलते रहेंगे
राम तो संग होंगे, कुछ रावण भी हाथ थामेंगे
अड़िग - अजय तू बस बढ़े चल, की सफर अभी बाकी है
है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है
पथ भी कभी छाव से अछूता कहाँ
महल भी मिलेंगे कभी बग़िया का आश्रय भी
पर यूँ तप्ता तू धूप में बढ़े चल की, सफर अभी बाकी है
है हताश यूँ क्यों तू की, सफर अभी बाकी है
तुझसे ही आरम्भ, तुझसे ही अंत ये सफ़रनामा है
जन्मों का ये सफ़र है, बस मंज़िल की दहलीज़-पार जाना है
हे पथिक उठ चल की, सफर अभी बाकी है
ना हो हताश यूँ तू की, सफर अभी बाकी है

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