Sunday, 18 October 2015

बेटी ऐसी होती है

बेटी ऐसी होती है 

एक  सपना था बहने का 
झील के ठहरे हुए पानी  की तरह नही 
जो सदियों तक वहीँ ठहरा रहता है 

एक सपना था बहने का 
नदी के उस बहते हुए पानी की तरह 
 रोकने  समर्थ किसी में नही 

एक सपना था हवा संग उड़ने का 
आसमान में उचाइयां छूटी उस पतंग की तरह नही 
क्योंकि उसकी डोर किसी और के हाथ होती है 

एक सपना था उड़ने का 
आसमान में उड़ते उस आज़ाद पंछी की तरह 
जो अपनी मंज़िल और उचाई का मालिक स्वयं होता है 

ये सपने न मेरे है न ही किसी ख्वाबों में खोये हुए बच्चे के 
ये सपने हैं हर बेटी के 

वही बेटी ,
जो एक परिवार की रौनक है ,
जो एक  पिता की मुस्कान है 
जो एक माँ की परछाई है 
जो एक भाई  की सबसे प्यारी दोस्त है

पर ! वो बेटी है कहाँ ??
वो तो शायद वही थी न 
जो किसी की बेटे की आस की बलि चढ़ गयी 
काश ! काश किसीने समझा होता की आखिर एक बेटी कैसी होती है??

काश किसी ने समझा होता 
की एक बेटी ये बीटा बन सकती है 
पर एक बेटा एक बेटी कभी नही बन सकता 

काश किसी ने समझा होता 
की एक बेटा ईटों की ईमारत बना सकता है 
पर एक बेटी दो- दो घरो की सँवारती है 

काश किसी ने समझा होता 
की अपने हर अरमान, हर सपने, हर ख़ुशी को मुस्करा कर त्याग करने वाली एक बेटी ही होती है 

ऐसी ही तोह होती है ना एक बेटी 
पर काश किसी ने समझा होता की आखिर एक बेटी कैसी होती है ??


  

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